अमेरिकी डॉलर अब बाजार में आने वाले झटकों से निवेशकों को सुरक्षित रखने वाली मुद्रा नहीं रह गया है। डॉयचे बैंक का अनुमान है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में अमेरिकी मुद्रा अपना सेफ-हेवन (Safe-Haven) का दर्जा खो चुकी है। अब जब भी टेक्नोलॉजी सेक्टर में गिरावट या करेक्शन आता है, तो अमेरिकी डॉलर भी बड़ी टेक कंपनियों (Big Tech) के शेयरों के साथ-साथ कमजोर होने लगता है।
बैंक के मुख्य FX रणनीतिकार जॉर्ज सारावेलोस ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी पर अभूतपूर्व रूप से निर्भर हो गई है। वर्तमान में शेयर बाजार में आने वाला विदेशी निवेश अमेरिका के चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) को पूरी तरह कवर करता है। उनका कहना है कि विदेशियों के पास मौजूद लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर की अमेरिकी प्रतिभूतियों (Securities) में से करीब 90% का मूल्य नए पूंजी निवेश के बजाय बाजार कीमतों में आई बढ़ोतरी को दर्शाता है।
पिछले एक दशक में विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर करेंसी जोखिम से बचाव (Currency Hedging) करना लगभग बंद कर दिया था। वे इस पैटर्न के आदी हो गए थे कि जब शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक गिरते हैं, तो अमेरिकी डॉलर मजबूत होकर उनके नुकसान की भरपाई कर देता है।
लेकिन अब यह नियम टूट चुका है। यदि किसी बड़े बाजार झटके की शुरुआत अमेरिकी बाजारों से होती है, तो शेयरों के साथ-साथ डॉलर भी कमजोर हो जाता है। इस स्थिति में विदेशी निवेशकों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप वे घबराहट में अमेरिकी संपत्तियों की बिकवाली करने लगते हैं और बड़े पैमाने पर करेंसी हेजिंग शुरू कर देते हैं।
डॉयचे बैंक का कहना है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की वास्तविक यील्ड (Real Yield) में गिरावट भी इस नए रुझान को और स्पष्ट करती है।
निवेशकों को अब अपनी गुलाबी उम्मीदों का चश्मा उतार देना चाहिए। अमेरिकी मुद्रा के सामने मौजूद जोखिम अब काफी बढ़ चुके हैं और वॉल स्ट्रीट ने पिछले कुछ हफ्तों में इन जोखिमों का जितना आकलन किया है, वास्तविक खतरा उससे कहीं अधिक हो सकता है।